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मुल्ला अफ़रोज़ पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी और यूपी सरकार पर 10 लाख का…

Author, विनीत भल्लापदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल निवासी

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल निवासी मुल्ला अफ़रोज़ के ख़िलाफ़ जारी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश मंगलवार को रद्द कर दिया. शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को भी पलट दिया, जिसमें इस हिरासत को क़ानूनी रूप से वैध माना गया था. अफ़रोज़ संभल के एक कारोबारी और प्रॉपर्टी डीलर हैं, जो फ़िलहाल मुरादाबाद ज़िला जेल में बंद हैं. यह पूरा मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा से जुड़ा है.

इस हिंसा में गोली लगने से चार लोगों

इस हिंसा में गोली लगने से चार लोगों की मौत हो गई थी. घटना के लगभग 54 दिन बाद पुलिस ने जनवरी 2025 में अफ़रोज़ को गिरफ़्तार किया था.

जब अफ़रोज़ को आपराधिक मामलों में ज़मानत मिलने

जब अफ़रोज़ को आपराधिक मामलों में ज़मानत मिलने लगी, तो संभल के ज़िला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत एक साल के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन लगा दी.

प्रिवेंटिव डिटेंशन एक ऐसा क़ानूनी प्रावधान है, जिसके

प्रिवेंटिव डिटेंशन एक ऐसा क़ानूनी प्रावधान है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को भविष्य में क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने से रोकने के लिए बिना ट्रायल के हिरासत में रखा जाता है.

अफ़रोज़ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस आदेश

अफ़रोज़ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी. जून 2026 में हाई कोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए ख़ारिज कर दी थी कि प्रशासन को हिरासत में लेने का पर्याप्त आधार लगा था और अदालत सबूतों की गहराई में नहीं जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने इस मामले में कई अहम क़ानूनी सवाल उठाए.

पुलिस का पूरा मामला मुख्य रूप से अफ़रोज़

पुलिस का पूरा मामला मुख्य रूप से अफ़रोज़ के उस इकबालिया बयान यानी कन्फेशन पर टिका था, जो कथित तौर पर पुलिस हिरासत में लिया गया था.

अफ़रोज़ का आरोप था कि यह बयान पुलिस

अफ़रोज़ का आरोप था कि यह बयान पुलिस ने प्रताड़ना और एनकाउंटर की धमकी देकर लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 20(3) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 23 का हवाला दिया.

ये क़ानून किसी भी व्यक्ति को ख़ुद के

ये क़ानून किसी भी व्यक्ति को ख़ुद के ख़िलाफ़ गवाही देने के लिए मजबूर करने से बचाते हैं और पुलिस के सामने दिए गए बयान को अदालत में पुख़्ता सबूत नहीं मानते.

अदालत ने अपने फ़ैसले में लिखा, "पुलिस अधिकारी

अदालत ने अपने फ़ैसले में लिखा, "पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया इकबालिया बयान, बिना किसी अन्य स्वतंत्र सबूत के, प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को सही ठहराने का आधार नहीं बन सकता."

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मुल्ला अफ़रोज़ पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी और यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना - BBC News हिंदी

Author, विनीत भल्लापदनाम, बीबीसी संवाददाता

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Source: BBC Hindi
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